बुधवार, 26 मई 2010

अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इंसान के बस का काम नहीं

रचनाकार: जिगर मुरादाबादी


अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इन्सान के बस का काम नहीं
फ़ैज़ाने-मोहब्बत[1] आम सही, इर्फ़ाने-मोहब्बत[2] आम नहीं

ये तूने कहा क्या ऐ नादाँ फ़ैयाज़ी-ए-क़ुदरत[3] आम नहीं
तू फ़िक्रो-नज़र[4] तो पैदाकर, क्या चीज़ है जो इनआम[5] नहीं

यारब ये मुकामे-इश्क़ है क्या गो दीदा-ओ-दिल नाकाम नहीं
तस्कीन[6] है और तस्कीन नहीं आराम है और आराम नहीं

आना है जो बज़्मे-जानाँ[7] में पिन्दारे-ख़ुदी[8] को तोड़ के आ
ऐ होशो-ख़िरद के दीवाने याँ होशो-ख़िरद[9] का काम नहीं

इश्क़ और गवारा ख़ुद कर ले बेशर्त शिकस्ते-फ़ाश[10] अपनी
दिल की भी कुछ उनके साज़िश है तन्हा ये नज़र का काम नहीं

सब जिसको असीरी[11] कहते हैं वो तो है असीरी ही लेकिन
वो कौन-सी आज़ादी है जहाँ, जो आप ख़ुद अपना दाम[12] नहीं

शब्दार्थ:

1. प्रेम की उदारता
2. प्रेम की पहचान
3. प्रकृति की उदारता
4. चिंतन और परख
5. पुरस्कार
6. चैन
7. प्रेयसी की महफ़िल
8. अहंकार
9. बुद्धि ,अक़्ल
10. पराजय
11. क़ैद
12. जाल

रविवार, 23 मई 2010

बच्चन जी की पुस्तक निशा निमंत्रण से कुछ पंक्तियाँ....
मैंने भी जीवन देखा है!

अखिल विश्व था आलिंगन में,
था समस्त जीवन चुम्बन में
युग कर पाए माप न जिसकी मैंने ऐसा क्षण देखा है!
मैंने भी जीवन देखा है!

सिंधु जहाँ था, मरु सोता है!
अचरज क्या मुझको होता है?
अतुल प्यार का अतुल घृणा में मैंने परिवर्तन देखा है!
मैंने भी जीवन देखा है!

प्रिय सब कुछ खोकर जीता हूँ,
चिर अभाव का मधु पीता हूँ,
यौवन रँगरलियों से प्यारा मैंने सूनापन देखा है!
मैंने भी जीवन देखा है!