शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

क्या हम जो भी होते हैं कुल मिलाकर वही, उतना ही होते हैं जो हमारे पैतृक गुणसूत्र, पारिवारिक संस्कार और प्रारम्भिक अनुभव हमें बना देते हैं ? उसके बाद जो भी होता है, जीवन - चरित नहीं, मात्र जीवन - वृत होता है ?

---- कसप से
---- मनोहर श्याम जोशी
प्यार के कैमरे के दो ही फोकस हैं - प्रिय का चेहरा, और वह न हो तो ऐसा कुछ जो अनंत दूरी पर स्तिथ हो |

---- कसप से
---- मनोहर श्याम जोशी

रविवार, 10 अप्रैल 2011

अकेलेपन में भी कुछ है जो नितांत आकर्षक है, सर्वथा सुखकर है लेकिन अफ़सोस कि उसे पा सकना अकेले के बस का नहीं |
---- कसप से
---- मनोहर श्याम जोशी

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

प्रेम होता ही अतिवादी है | यह बात प्रौड़ होकर ही समझ आती है उसके कि विधाता अमूमन इतना अतिवाद पसंद करता नहीं | खैर, सयाना - समझदार होकर प्यार, प्यार कहाँ रह पाता है !
---- कसप से
---- मनोहर श्याम जोशी