सोमवार, 11 मार्च 2013

रात पहाड़ों  पर कुछ और ही होती है…. 

 
-----गुलज़ार 
 
रात पहाड़ों पर कुछ  और ही होती है 
आसमान बुझता ही नहीं,
और दरिया रौशन रहता है 
इतनी ज़री का काम नज़र आता है फ़लक पे तारों का 
जैसे रात में ' प्लेन ' से रौशन शहर दिखाई देते हैं!
 
पास ही दरिया आँख पे  पट्टी बाँध के 
पेड़ों के झुरमुट में 
कोड़ा जमाल शाही, "आई जुमेरात आई .... पीछे देखे शामत आई ...."
दौड़-दौड़ के खेलता है !
 
कंघी रखके दांतों में 
आवाज किया करती है हवा 
कुछ फटी-फटी ... झीनी-झीनी ....
बालिग़ होते लडको की तरह!
 
इतना ऊँचा - ऊँचा बोलते हैं दो झरने आपस में 
जैसे एक देहात के दोस्त अचानक मिलकर  वादी में 
गाँव भर का पूछते हों ...
नज़म भी आधी आँखें खोल के सोती है 
रात पहाड़ों पर कुछ और हे होती है !!
 

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

क्या हम जो भी होते हैं कुल मिलाकर वही, उतना ही होते हैं जो हमारे पैतृक गुणसूत्र, पारिवारिक संस्कार और प्रारम्भिक अनुभव हमें बना देते हैं ? उसके बाद जो भी होता है, जीवन - चरित नहीं, मात्र जीवन - वृत होता है ?

---- कसप से
---- मनोहर श्याम जोशी
प्यार के कैमरे के दो ही फोकस हैं - प्रिय का चेहरा, और वह न हो तो ऐसा कुछ जो अनंत दूरी पर स्तिथ हो |

---- कसप से
---- मनोहर श्याम जोशी

रविवार, 10 अप्रैल 2011

अकेलेपन में भी कुछ है जो नितांत आकर्षक है, सर्वथा सुखकर है लेकिन अफ़सोस कि उसे पा सकना अकेले के बस का नहीं |
---- कसप से
---- मनोहर श्याम जोशी

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

प्रेम होता ही अतिवादी है | यह बात प्रौड़ होकर ही समझ आती है उसके कि विधाता अमूमन इतना अतिवाद पसंद करता नहीं | खैर, सयाना - समझदार होकर प्यार, प्यार कहाँ रह पाता है !
---- कसप से
---- मनोहर श्याम जोशी

रविवार, 13 मार्च 2011

जो नहीं है, उसे खोज लेना शोधकर्ता का काम है | काम जिस तरह होना चाहिए, उस तरह न होने देना विशेषज्ञ का काम है | जिस बिमारी से आदमी मर रहा है, उससे उसे न मरने देकर दूसरी बिमारी से मार डालना डॉक्टर का काम है | अगर जनता सही रास्ते पर जा रही है, तो उसे गलत रास्ते पर ले जाना नेता का काम है | ऐसा पढ़ाना कि छात्र बाज़ार में सबसे अच्छे नोट्स कि खोज में समर्थ हो जाएँ, प्रोफेसर का काम है |

----- हरिशंकर परसाई