सोमवार, 11 मार्च 2013

रात पहाड़ों  पर कुछ और ही होती है…. 

 
-----गुलज़ार 
 
रात पहाड़ों पर कुछ  और ही होती है 
आसमान बुझता ही नहीं,
और दरिया रौशन रहता है 
इतनी ज़री का काम नज़र आता है फ़लक पे तारों का 
जैसे रात में ' प्लेन ' से रौशन शहर दिखाई देते हैं!
 
पास ही दरिया आँख पे  पट्टी बाँध के 
पेड़ों के झुरमुट में 
कोड़ा जमाल शाही, "आई जुमेरात आई .... पीछे देखे शामत आई ...."
दौड़-दौड़ के खेलता है !
 
कंघी रखके दांतों में 
आवाज किया करती है हवा 
कुछ फटी-फटी ... झीनी-झीनी ....
बालिग़ होते लडको की तरह!
 
इतना ऊँचा - ऊँचा बोलते हैं दो झरने आपस में 
जैसे एक देहात के दोस्त अचानक मिलकर  वादी में 
गाँव भर का पूछते हों ...
नज़म भी आधी आँखें खोल के सोती है 
रात पहाड़ों पर कुछ और हे होती है !!