क्या हम जो भी होते हैं कुल मिलाकर वही, उतना ही होते हैं जो हमारे पैतृक गुणसूत्र, पारिवारिक संस्कार और प्रारम्भिक अनुभव हमें बना देते हैं ? उसके बाद जो भी होता है, जीवन - चरित नहीं, मात्र जीवन - वृत होता है ?
---- कसप से
---- मनोहर श्याम जोशी
शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011
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