रविवार, 23 मई 2010

बच्चन जी की पुस्तक निशा निमंत्रण से कुछ पंक्तियाँ....
मैंने भी जीवन देखा है!

अखिल विश्व था आलिंगन में,
था समस्त जीवन चुम्बन में
युग कर पाए माप न जिसकी मैंने ऐसा क्षण देखा है!
मैंने भी जीवन देखा है!

सिंधु जहाँ था, मरु सोता है!
अचरज क्या मुझको होता है?
अतुल प्यार का अतुल घृणा में मैंने परिवर्तन देखा है!
मैंने भी जीवन देखा है!

प्रिय सब कुछ खोकर जीता हूँ,
चिर अभाव का मधु पीता हूँ,
यौवन रँगरलियों से प्यारा मैंने सूनापन देखा है!
मैंने भी जीवन देखा है!

3 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

युग कर पाए माप न जिसकी मैंने ऐसा क्षण देखा है! ...
अतुल प्यार का अतुल घृणा में मैंने परिवर्तन देखा है!...
यौवन रँगरलियों से प्यारा मैंने सूनापन देखा है!
मैंने भी जीवन देखा है!"

बहुत खूब - बच्चन जी की रचना पढवाने के लिए धन्यवाद्

Sarita ने कहा…

सराहनीय प्रयास। चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है। हिंदी ब्लागिंग को आप और ऊंचाई तक पहुंचाएं, यही कामना है।
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अजय कुमार ने कहा…

हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें