शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

तरह-तरह के संघर्ष में तरह- तरह के दुःख हैं| एक जीवित रहने का संघर्ष है और एक सम्पन्नता का संघर्ष है| एकन्यूनतम जीवन-स्तर ना कर पाने का दुःख है, एक पर्याप्त सम्पन्नता ना होने का दुःख है| ऐसे में कोई अपने टुच्चेदुखो को लेकर कैसे बैठे?
------ सोजन्य से
हरिशंकर परसाई

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